गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

जन्मसिद्धअधिकार

 सभी कुछ अपना है, सब मेरा है की नीति का चलन इतनी तेजी से पांव पसार चुका है की अच्छा बुरा कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता /  सब कुछ होते हुए भी पेट ही नहीं भरता, कहने को तो पूरी पृथ्वी ही अपनी है पर तसल्ली से पेट कहाँ भरता , खाली पड़ी जमीन देखि मेरी है , कब्ज़ा कर लिया किसी और की अमीर होते  देख  इर्ष्या उत्पन्न हो गई, किसी की गरीबी देखी प्रसन्न होते हैं मगर मदद किसी की नहीं कर सकते बल्कि मदद लेने की फिराक में रहते हैं , कोई  भी सरकारी योजना आई पहले इन्ही को फायदा चाहिए यहाँ तक की गरीबों की मजदूरी भी इन्हें चाहिए , सस्ता अनाज भी चाहिए, यहाँ तक की भंडारे में कतार में सबसे आगे जगह मिलनी चाहिए, मंदिर में भगवान के दर्शन भी विशेष अथिति के रूप होने चाहिए, अमीर होने के नाते मोहल्ले के किसी कार्यक्रम में विशेष अथित के रूप में आमंत्रित होने चाहिए, गली चौराहे पर लोगबाग झुक कर प्रणाम भी इन्हें करें , कोई चीज पसंद आ जाये तो मांगने की आवस्यकता नहीं पड़ती ले लेते हैं नहीं मिलती तो छीन लेते हैं, सरकारी पानी वाला नल, फ्लड लाइट सबसे पहले इन्ही के दरवाजे पर लगनी चाहिए , इलाके में कोई घटना होने पर पंचायत भी यही करेंगे तथा थानेदार भी इन्ही से सबसे पहले मिलेंगे , सुलहनामे में इनका भी हिस्सा होगा, कमी है न / आगे चल कर चुनाव भी तो यही लड़ेंगे, क्यूंकि इनका जन्मसिद्ध अधिकार है /

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