शुक्रवार, 21 मई 2010
नक्सलवाद Naksalvad
यह कोई एक दिन में बन कर तैयार नहीं हो गया, नक्सलवाद आज धीरे धीरे पूरे देश में फैलता जा रहा है । सब अपनी अपनी बयान बाजी करते घूम रहे हैं। कभी कोई यह नहीं सोंचता की नक्सलबाड़ का जन्म क्यूँ हुआ । कैसे इतने सारे लोग इनके साथ जुड़ गये, इंतना बड़ा संगठन बन कर कोई एक दिन में नहीं खड़ा हो गया । इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं , कहीं गरीबी ,उतपीरण या कोई विदेशी साजिश भी हो सकती है।
मंगलवार, 18 मई 2010
जाति
समाज को और गर्त में ले जाने के लिए आज के नेता जो चाल चल रहें हैं , वह देश के लिए बहुत ही घातक है / क्या देश के तीन नेताओं ने देश को गुलाम बना रखा है / मुलायम सिंह यादव ,शरद यादव , लालू यादव ये लोग क्या साबित करना चाहते हैं / क्या देश में कितने यादव हैं यह जानना चाहते हैं / क्या ये सिर्फ इन्ही का भला चाहते हैं ,क्या कोई और जाति का वयेक्ति वोट नहीं देता /
मंगलवार, 11 मई 2010
मिलावट खोर
हम सब खाना नहीं खा रहे, जहर खा रहे हैं जो धीरे धीरे नस्ल परिवर्तन कर रहा हैI एक दिन ऐसा आयेगा जब सब जानवर से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर होंगे, अजीब बीमारियों से ग्रसित होंगे जिनका कोई इलाज भी नहीं होगा बल्कि बीमारियों से ग्रसित इंसान को उसी नस्ल का मान लिया जायेगा I आगे की पीड़ियाँ सोंचेंगी हमारे पूर्वज ऐसे ही थे I यह सब क्यों हो रहा है सिर्फ सिर्फ पैसे के लिए, यह कौन लोग हैं जो ऐसी घिनौनी हरकत कर रहें यह कोई गरीब या अनपढ़ लोग नहीं कर रहे I यह दो तरह के मिलावट खोर हैं १. व्यापारी वर्ग से २. किसान वर्ग तथा दोनों वर्गों में जो सक्षम हैं वही यह कार्य कर रहे हैं ये शीध्र ही और अमीर बनना चाहते हैं I व्यापारी लाल मिर्च में ईंट, धनिया में लीद, कलि मिर्च में पपीते का बीज, तेल में कैमिकल , घी में जानवरों की हड्डियों की मज्जा, कैमिकल, खोये में आरारोड, दूध में निरमा, योरिया, बच्चों की ही नस्ल बर्बाद कर रहें हैं I कथित किसान भाई भी पीछे नहीं, वह भी जिनके पास सोना उगलने वाली जमीने हैं, स्टेरोइड के injection जो जानवरों के दूध बड़ाने के लिए भैस व् गाये को लगाते हैं उसी से लौकी ,कद्दू ,खीरा, ककड़ी आदि सब्जियों में लगाते हैं जो दो दिन में बड़ कर लम्बी हो जाती हैI आज कल आपने देखा होगा महिलाओं व् लड़कियों के भी दाड़ी-मुछ में बाल नजर आते हैं, क्या पता जो ब्रांडेड कंपनी हैं उनके उत्पाद भी भी मिलावट वाले हों , क्यूंकि पकडे गये लोगों के पास ब्रांडेड कंपनी के रैपर मिले I नयी नयी बीमारियों का कारण भी यही है मेरी समझ में यह नहीं आता ये इस तरह से पैसे बना कर क्या करना चाहते हैं, क्या इनके बीवी-बच्चे नहीं है, क्या शुद्ध चीजें बाज़ार में कोई लेता नहीं है .........शेष
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
जन्मसिद्धअधिकार
सभी कुछ अपना है, सब मेरा है की नीति का चलन इतनी तेजी से पांव पसार चुका है की अच्छा बुरा कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता / सब कुछ होते हुए भी पेट ही नहीं भरता, कहने को तो पूरी पृथ्वी ही अपनी है पर तसल्ली से पेट कहाँ भरता , खाली पड़ी जमीन देखि मेरी है , कब्ज़ा कर लिया किसी और की अमीर होते देख इर्ष्या उत्पन्न हो गई, किसी की गरीबी देखी प्रसन्न होते हैं मगर मदद किसी की नहीं कर सकते बल्कि मदद लेने की फिराक में रहते हैं , कोई भी सरकारी योजना आई पहले इन्ही को फायदा चाहिए यहाँ तक की गरीबों की मजदूरी भी इन्हें चाहिए , सस्ता अनाज भी चाहिए, यहाँ तक की भंडारे में कतार में सबसे आगे जगह मिलनी चाहिए, मंदिर में भगवान के दर्शन भी विशेष अथिति के रूप होने चाहिए, अमीर होने के नाते मोहल्ले के किसी कार्यक्रम में विशेष अथित के रूप में आमंत्रित होने चाहिए, गली चौराहे पर लोगबाग झुक कर प्रणाम भी इन्हें करें , कोई चीज पसंद आ जाये तो मांगने की आवस्यकता नहीं पड़ती ले लेते हैं नहीं मिलती तो छीन लेते हैं, सरकारी पानी वाला नल, फ्लड लाइट सबसे पहले इन्ही के दरवाजे पर लगनी चाहिए , इलाके में कोई घटना होने पर पंचायत भी यही करेंगे तथा थानेदार भी इन्ही से सबसे पहले मिलेंगे , सुलहनामे में इनका भी हिस्सा होगा, कमी है न / आगे चल कर चुनाव भी तो यही लड़ेंगे, क्यूंकि इनका जन्मसिद्ध अधिकार है /
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
सिफारिश
आज जिनके पास किसी भी प्रकार की पहुँच होती है वह जीवन में तरक्की शीध्र कर लेता है, तथा सुखी जीवन जीता है उसके पास ज्ञान की चाहे जितनी कमी हो परन्तु एक बार जब वह किसी मकसद के लिए चुन लिया जाता है तो उसे उस कार्य का महारथी मान लिया जाता है किसी को नहीं पता होता है उसके रहस्यों के बारे में न ही कोई जानने की कोशिश करता है फिर लोग उसे उसके पद व् व्यवसाये से ही जानते हैं पहचानते है वह वहां तक कैसे पंहुचा कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता यदि किसी को पता भी होता है, तो वह सोंचता है क्यों किसी के पेट पर लात मारें लकिन वे भूल जाते हैं की उसने भी किसी का हक़ छीना है, ऐसे नाकाबिल लोग यदि किसी संगठन या देश या संस्था को चलायें गे तो समाज व् देश का क्या होगा, आज बहुत सारे कानून बने हुए हैं परन्तु उनका पालन नहीं हो रहा, कागजी खाना पूर्ति तो ऐसे होती है जैसे सब कुछ साफ सुथरा इमानदारी से कार्य हो रहा है, आज जो जितनी जानी मानी सर्वोच्च संस्था है चाहे वह देश की शिक्षा संस्था हो या अन्य क्यूंकि इनके नाम को सुनकर लोग अभिभूत हो जाते हैं,जैसे किसी की सुंदर काया को देखकर उसके अंदर के अवगुणों को भूल जाते हैं , बस यहीं वो धोखा खा जाते हैं जब की वहां पर भ्रस्टाचार चरम पर है उपलब्धियां गिनाई जाती है लेकिन ये उपलब्धियां जाती कहाँ हैं इनका होता क्या है यह लूग भूल जाते है जाँच भी यदि की जाये तो भी नहीं हो सकती बुद्धिमान को पराजित करना ही कठिन कार्य है कुल मिलकर लूट घसोट मची है जनता अपना पेट पाले यह या इनकी बुराइयाँ गिनाये उसके पास भी समय नहीं है पर कुछ लोगों के चक्कर में दिग्भ्रमित रहती है पर भ्रस्टाचार चरम पर है ..................... इस पर सोंचने की जरूरत है
धन्यवाद
धन्यवाद
मंगलवार, 30 मार्च 2010
ट्राफिक
ट्राफिक की समस्या विकट रूप धारण करती जा रही है, आज महानगरों का विस्तार तेजी से होता जा रहा है, गाँव से जनता शहरों की ओर पलायन कर रही है उसकी भी कोई वजह है ! परन्तु सरकार का कार्य है सुविधाएँ देना पर ऐसा नहीं हो पा रहा है , प्रति दिन धटनाएं हो रही हैं ,औरतें विधवा हो रही हैं, बच्चे अनाथ हो रहे है, किसी का पूरा परिवार तहस नहस हो रहा है , दूसरी समस्या जाम की है , ओवेरब्रिज बनाने के लिए पिछले दस सालों से ( कानपुर ) पैसा पास होता है ,अखवारों में रोज खबरें छपती हैं दस ओवेरब्रिज बनेगे, दो बाई पास निकलेंगे , circle lane बनेगें मगर चुनाव बाद सब ख़त्म बांकी टीका टिप्पड़ी होती रहती है बाद में बोलते हैं उनकी सरकार ने नहीं क्या ,मैंने पैसा पास करवाया किन्तु लोग मरते हैं तो मरने दें हमारी गाड़ी सुरक्षित निकल जाती है, जनता को इतनी समझ कहाँ ................क्या होगा इस देश का जब एक शहर का विकाश नहीं कर सकते तो देश का विकाश क्या करेंगें ...........
बुधवार, 17 मार्च 2010
Bikhare Moti
कुछ भी ठीक नहीं है, देश के अंदर जो भी हो रहा है वह अनिष्ट की आशंका उत्पन्न कर रहा है आज इन्शान पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार है,क्या पैसा ही जीवन का उद्देश्य बन गया है ! क्या प्राचीन परम्पराएं , इतिहास, तथा महान उपलब्धियां विलुप्त हो गईं, क्या ऋषि मुनियों के देश मे सब कुछ धन के लिए होता था, यदि धन के लिए होता तब आज हम व् हमारी सभ्यता विलुप्त हो गई होती, विश्व के अधिकांश देशों की सभ्यताएं विलुप्त हो चुकीं तथा जिन देशों पर आज भी वह राज कर रहें हैं , तथा वहां का मूल निवासी विलुप्त प्राय हो गया तथा प्रतीक भी नहीं बचा क्यूंकि वहां भारत जैसी आत्माओं ने जन्म नहीं लिया था ...........शेष
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